४. नर्मदा परिक्रमा: ओंकारेश्वर की पहली रात: अप्रत्याशित घटनाएँ और संघर्ष

 

ओंकारेश्वर की पहली रात: अप्रत्याशित घटनाएँ और संघर्ष

पिछले भाग में हमने देखा कि गाँव जाकर बड़ों और कुलदेवता की अनुमति लेकर मैं नर्मदा परिक्रमा के लिए सज्जित हो चुका था। १ दिसंबर को पुणे से खंडवा के लिए प्रस्थान किया। भोर में खंडवा पहुँचने के बाद ओंकारेश्वर जाने वाली एक निजी बस में सवार हुआ।

उस बस में मेरे साथ दो अन्य व्यक्ति थे, जिनका आगे मेरी यात्रा पर बड़ा प्रभाव पड़ने वाला था। मेरे पीछे दो-तीन सीटें छोड़कर पुणे से रेलगाड़ी द्वारा आए एक वृद्ध सज्जन बैठे थे। तभी, नीले जैकेट में एक व्यक्ति थैला लेकर हड़बड़ी में गाड़ी में चढ़ा। पहले वह ड्राइवर की केबिन में बैठा, पर बाद में उसे क्या लगा, वह दरवाज़े के पास की सीट पर आकर बैठ गया। कौन था वह? और उसका ज़िक्र मैं क्यों कर रहा हूँ? यह आपको आगे पता चलेगा ही।

लगभग डेढ़-दो घंटे में हम ओंकारेश्वर पहुँचे। बस स्टैंड से मुझे जहाँ उतरना था, उस गजानन महाराज आश्रम की दूरी लगभग दो-तीन किलोमीटर थी। सुबह का समय था, इसलिए मैं पैदल ही निकल पड़ा। मेरे पीछे बैठे वह सज्जन तेज़ी से चलते हुए आगे निकल गए। अपने हाथ में भारी बैग सँभालते हुए मैं पौन घंटे में आश्रम पहुँचा।

आश्रम में नाम-पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) करवाकर मैं परिक्रमावासियों के हॉल में गया और सामान रखा। वहाँ मुझे आश्चर्य का झटका लगा। मेरे साथ बस से आए और पुणे से रेल से आए वह सज्जन मेरे ठीक बगल में ठहरे हुए थे। उस समय हमारी कोई बातचीत नहीं हुई, क्योंकि मैं तुरंत स्नान करके गजानन महाराज के दर्शन करने और गोमुख घाट पर नर्मदा किनारे चला गया। वहाँ से ओंकारेश्वर के दर्शन करने के लिए गया।

मंदिर का विवाद और अहंकार का संघर्ष

ओंकारेश्वर के दर्शन की कतार में खड़े रहते हुए एक अप्रत्याशित घटना घटी। मेरे पीछे बड़ा शोर सुनाई दिया। "चलो हटो, महाराज जी को जाने दो!" पीछे देखा तो श्वेत वेशभूषा में एक संन्यासी चल रहे थे। उनके शिष्य कतार में खड़े हर व्यक्ति को गिरेबान पकड़कर किनारे कर रहे थे।

वे मेरे पास पहुँचे। एक शिष्य ने मेरी भी कॉलर खींची। मैं बगल की लोहे की रेलिंग को कसकर पकड़कर खड़ा रहा। उस शिष्य ने फिर ज़ोर से खींचा और मुझ पर चिल्लाया, "सुनाई नहीं देता क्या, बाजू हटो!"

मैंने शांति से कहा, "मैं कतार में खड़ा हूँ।"

यह सुनकर वह शिष्य और उसके दो सहयोगी मेरे ऊपर झपटने लगे। लेकिन उनके और मेरे बीच उनके महाराज जी खड़े थे, इसलिए उन्हें असुविधा हुई। वे बहस करने का प्रयास करने लगे।

मैंने उन्हें दृढ़ता से कहा, "भगवान के द्वार पर सब समान होते हैं, चाहे आम आदमी हो या साधु-संन्यासी।"

मेरी इस बात पर वे और भी भड़क उठे। तभी मैंने सीधे उस संन्यासी से ही सवाल किया, "ये हैं आपके शिष्य? ऐसे ही संस्कार दिए हैं आपने अपने शिष्यों को? भगवान के द्वार पर हाथापाई करने के?"

यह सुनते ही उस संन्यासी का मानो आत्मबल गिर गया। उनकी शिक्षा पर सीधा प्रहार होने के कारण वह विचार में पड़ गए। उन्होंने तुरंत अपने शिष्यों पर चिल्लाकर उन्हें शांत किया। लगभग दस-पंद्रह मिनट की चुप्पी के बाद वह मेरे सामने हाथ जोड़कर विनती के स्वर में बोले, "हमें जाने दीजिये। इस भीड़ में दम घुटकर हम मर जाएँगे।" तब मैंने उन्हें आगे जाने के लिए रास्ता दिया। लेकिन तब तक कतार में खड़े लोगों में "अच्छा हुआ, सबक सिखाया" ऐसी फुसफुसाहट शुरू हो गई थी।

टोपी पहने हुए नवले सर

मांधाता परिक्रमा: रहस्यमय रात की गुप्त चाल

शाम को पाँच-सवा पाँच बजे के आसपास मैं दर्शन करके आश्रम लौटा। अगले दिन मांधाता परिक्रमा करके, यानी ४ दिसंबर को, मुख्य परिक्रमा शुरू करने का मेरा विचार था। आश्रम लौटकर मेरे बगल में ठहरे पुणे के उन सज्जन से बातचीत शुरू हुई। उन्होंने अपना नाम नवले और खुद को माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त बताया। उन्होंने इससे पहले तीन परिक्रमाएँ की थीं और यह उनकी चौथी परिक्रमा थी। मेरा भी पुणे से होना सुनकर हमारी अच्छी बातचीत शुरू हो गई।

"क्या आपने मांधाता परिक्रमा कर ली?" नवले सर ने पूछा।

मैंने 'नहीं, कल करने का विचार है' बताया।

तब तक शाम ढलने लगी थी। वह बोले, "कल क्यों? अभी जाइए। आज डेढ़ घंटे में आपकी मांधाता परिक्रमा पूरी हो जाएगी। कल सुबह हमें मुख्य परिक्रमा के लिए निकलना है।"

मैंने उनकी बात सुनी और मांधाता परिक्रमा के लिए निकल पड़ा। सर्दी के दिन थे, इसलिए ओंकारेश्वर मंदिर से परिक्रमा शुरू करते ही अंधेरा छाने लगा। लगभग एक किलोमीटर जाने के बाद घुप अँधेरा हो गया। परिक्रमा मार्ग पर लगे टिमटिमाते पथ-दीप मुश्किल से रास्ता दिखा रहे थे। सड़क पर कोई भी नहीं था। ऐसे रहस्यमयी  वातावरण की आदत न रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस समय यहाँ आकर ज़रूर घबरा गया होता।

मैं थोड़ा आगे बढ़ा तो सामने से किसी के आने का आभास हुआ। एक पथ-दीप के नीचे आने पर उसकी आकृति स्पष्ट दिखी। वह बीस-बाईस साल का एक युवक था। मुझे दूर से देखकर वह वहीं ठिठक गया। उसने इधर-उधर देखा। शायद वह किनारे हटने की जगह ढूँढ रहा था। मैं अपनी गति से उसकी ओर चल रहा था। एकदम से वह वहीं जड़वत् हो गया। मेरे पास आते ही उसने 'राम-राम' कहा। इतने में मुझे समझ आ गया था कि यह युवक मुझे "अमानवीय शक्ति" समझ रहा है और उसकी अच्छी-ख़ासी घिग्घी बँध गई है। मैंने उसे क्रॉस करके आगे बढ़ते ही उसने भागना शुरू किया। मुझसे हँसी नहीं रुकी।

मैं चलते-चलते कावेरी संगम तक आ गया। मेरी पहली ही परिक्रमा थी, इसलिए संगम इस क्षेत्र में है, इतना ही मुझे पता था, पर वह ठीक कहाँ है, यह समझ नहीं आया। उस क्षेत्र में केवल एक ही पथ-दीप जल रहा था, इसलिए मुश्किल से प्रकाश था। मैंने अपने मोबाइल की बैटरी (टॉर्च) चालू की और चलने लगा। अनजाने में मैं ऋणमुक्तेश्वर मंदिर से संगम की ओर निकल गया। झींगुरों की झनकार, दूर कहीं किसी कुत्ते का भौंकना और पानी के कलकल बहने की आवाज़ से वातावरण का रहस्य और भी भयानक हो रहा था।

पानी की आवाज़ बढ़ने पर मुझे महसूस हुआ कि मैं रास्ता भटक गया हूँ। मोबाइल के प्रकाश में संगम के पास के कालभैरव मंदिर का बोर्ड दिखा। वहाँ कोई नहीं था। लेकिन एक मेज़ पर एक विशाल काला कुत्ता आराम से पसरा हुआ था। इतना बड़ा कुत्ता मैंने जीवन में शायद ही कभी देखा होगा। उसने लेटे-लेटे ही मेरी ओर देखा, पर गर्दन उठाने का कष्ट भी नहीं किया।

मैं वहाँ से लौट पड़ा। मेरे पीछे लगभग ५०-६० कदमों पर काले कपड़ों में अघोरी जैसा दिखने वाला एक साधु आ रहा था। उसकी चलने की स्थिति से स्पष्ट था कि वह अत्यधिक नशे या ध्यान की अवस्था में था। फिर भी उसने लड़खड़ाते हुए ही मुझे 'नर्मदे हर' कहा।

मैं ऋणमुक्तेश्वर तक वापस आकर आगे का रास्ता पकड़ा। इस मार्ग पर आगे कुछ झोपड़ीनुमा घर और एक-दो आश्रम मिले, पर वहाँ सन्नाटा था। ऐसे सस्पेंस-थ्रिलर फ़िल्म के योग्य वातावरण में डेढ़ घंटा चलकर मैंने मांधाता परिक्रमा पूरी की और आश्रम लौट आया।

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The author's very first night in Omkareshwar is marked by an unexpected confrontation with a sanyasi and his arrogant disciples at the temple, followed by a suspenseful, solo night-time completion of the challenging Mandhata Parikrama, setting the tone for the long journey ahead.

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